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फिल्म रिव्यु : 'फैन' Film Review - FAN

शाहरुख खान की फिल्म 'फैन' का देशभर में बेसब्री से इंतजार कर रहे दर्शकों का इंतजार आज ख़त्म हुआ । एक सुपरस्टार और उनके सबसे बड़े फैन की दीवानगी और पागलपन पर बेस्ड किंग खान की फिल्म 'फैन' रिलीज हो गई है।

'फैन' की कहानी है एक सुपरस्टार आर्यन खन्ना (शाहरुख खान) के फैन गौरव चन्ना (शाहरुख खान) की, जो ना केवल थोड़ा बहुत उनकी तरह दिखता ही नहीं बल्कि उसकी जैसी एक्टिंग भी कर लेता है।  गौरव चांदना दिल्ली में एक साइबर कैफे चलता है। मोहल्ले के लोग उसे जूनियर आर्यन खन्ना बुलाते है। मोहल्ले में हुए एक कॉम्पिटिशन में वह आर्यन खन्ना का एक्ट करता है, इसे जीतने पर उसे 20 हजार रुपए ईनाम में मिलते हैं। इन पैसों को लेकर वह आर्यन के 48वें बर्थडे पर बिना टिकट लिए मुंबई पहुंच जाता है। वह पाली की उसी होटल और रूम में रुकता है, जहां पहली बार आर्यन खन्ना ठहरा था। वो आर्यन के घर जाता है लेकिन उससे मिल नहीं पाता है। उसी दौरान उसे पता चलता है कि आर्यन का कंपटीटर हीरो आर्यन के लिए मुसीबत बन रहा है।  आर्यन के लिए एक न्यू कमर एक्टर सिड कपूर को पीटना है, उससे जबरदस्ती सॉरी बुलवाता है और इस वीडियो को फेसबुक पर शेयर कर देता है। सबको लगता है कि यह वीडियो आर्यन खन्ना का है, इसी वजह से यह मीडिया और फैन्स के बीच चर्चा का विषय बन जाता है। जो आर्यन को बिल्कुल पसंद नहीं आता है और तो वह गौरव को अरेस्ट करवा देता है।  यह बात गौरव को बहुत बुरी लगती है और वो ठान लेता है कि आर्यन खन्ना को बर्बाद कर डालेगा। असली कहानी अब  शुरू होती है एक सुपरस्टार और उसके सबसे बड़े फैन के बीच जंग। इस जंग में किसकी हार और किसकी जीत होती है। गौरव बकायदा पैसे का इंतजाम करता है और आर्यन को बदनाम करने का प्लान बनाता है। इसके लिए वो किस हद तक जाता है आप देखकर हैरान रह जाएंगे।

इस फिल्म में सालों से बॉलीवुड पर राज कर रहे शाहरुख की एक्टिंग अलग ही लेवल की है।  फिल्म देखकर आपको विश्वास नहीं होगा कि आर्यन और गौरव दोनों का किरदार शाहरुख ने ही निभाया है। फिल्म की कहानी ट्रेलर से ही काफी दिलचस्प लग रही थी और काफी हद तक कहानी दर्शकों को बांधें रखती है। लेकिन फिल्म का सेकंड हाफ थोड़ा बड़ा है, जिसमें कहानी लंदन से होकर मुंबई और दिल्ली तक पहुंचती हैं। इसे और बेहतर तरह का अंजाम दिया जा सकता था।  फिल्म का पहला सॉन्ग 'जबरा फैन' शुरुआत से ही दर्शकों की जुबां पर चढ़ा हुआ है। हालांकि, ये गाने फिल्म में दिखाया नहीं गया है। यह शाहरुख की सॉन्गलैस फिल्म है।

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फिल्म रिव्यु : 'जय गंगाजल' - Film Review : Jai Gangajal


'जय गंगाजल' की स्टोरी बिहार के बांकीपुर जिला के करप्ट एमएलए बबलू पांडे (मानव कौल) और एस पी आभा माथुर (प्रियंका चोपड़ा) के इर्दगिर्द घूमती है। आभा की पहली पोस्टिंग बांकीपुर जिला में होती है और वह इस जिले की पहली महिला एसपी है। बबलू पांडे और उसका भाई (निनाद कामत) अपने फायदे को लेकर किसानों की जमीन हड़पते हैं। बबलू पांडे के खिलाफ लड़ने में आभा के आड़े भोलानाथ सिंह (प्रकाश झा) आता है, जो कि करप्ट पुलिसकर्मी है। इन क्रिमिनल्स और पुलिस वाले के खिलाफ जाकर कैसे जनता को इंसाफ दिलाती हैं आभा? वह जीत पाती है या नहीं? यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी।

एक्टिंग सभी की शानदार है, खासकर प्रियंका ने महिला पुलिस ऑफिसर के रोल में जान डाल दी है। पीसी के अलावा प्रकाश झा, मानव कौल और निनाद कामत की तारीफ करनी होगी। फिल्म में प्रियंका चोपड़ा ने बहादुर पुलिस ऑफिसर का रोल निभाया है। पिछली फिल्म में यही किरदार अजय देवगन ने बखूबी प्ले किया था। डायरेक्शन के साथ एक्टिंग के मामले में प्रकाश झा ने अच्छा काम किया है। हालांकि, एक्टिंग में वे इतने डूब गए कि डायरेक्शन में कहीं-कहीं कमी नजर आई। फर्स्ट हाफ में फिल्म कुछ हिस्सों में स्लो लगी।

इस एक्शन ड्रामा फिल्म में म्यूजिक के नाम पर कुछ भी नहीं है, इसका बैकग्राउंड स्कोर भी ठीक ठाक है। 2003 में आई अजय देवगन की गंगाजल दर्शकों द्वारा बेहद पसंद की गई थी। हालांकि, सीक्वल में पुरानी फिल्म जैसा फील नहीं है। बावजूद इसके प्रियंका की एक्टिंग और अच्छी कहानी के लिए 'जय गंगाजल' देखी जा सकती है।

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फिल्म रिव्यु : अलीगढ़ - Movie review : Aligarh

फिल्म का नाम: अलीगढ़
डायरेक्टर: हंसल मेहता 
स्टार कास्ट: मनोज बाजपेयी, राजकुमार राव, आशीष विद्यार्थी 
अवधि: 2 घंटा 
सर्टिफिकेट: A
रेटिंग: 4 स्टार
हंसल मेहता एक ऐसे निर्माता निर्देशक हैं, जिनका काम पर्दे पर बोलता है और उन्होंने इस बात को अपनी नेशनल अवॉर्ड विनिंग फिल्म 'शाहिद' के माध्यम से भी साबित कर दिया है. एक बार फिर से हंसल मेहता ने असल जिंदगी से प्रेरित होकर 'अलीगढ़' फिल्म बनाई है जो सत्य घटनाओं पर आधारित है. फिल्म को मुंबई फिल्म फेस्टिवल, बुसान फिल्म फेस्टिवल और लंदन के फिल्म समारोह में भी दिखाया जा चुका है जहां इसकी जमकर सराहना की गई है, अब क्या यह फिल्म भी हंसल की बाकी फिल्मों के जैसे आपको सोचने पर विवश कर पाएगी? 

अलीगढ़, प्रोफेसर डॉक्टर एस आर सिरस (मनोज बाजपेयी) की कहानी है जो उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ नामक जगह पर स्थित अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं. 8 फरवरी 2010 को प्रॉफेसर सिरस को पुरुष के साथ यौन सम्बन्ध बनाने के आरोप में यूनिवर्सिटी से सस्पेंड कर दिया जाता है और इस पूरी खबर पर दिल्ली का रहने वाला पत्रकार दिपु सेबेस्टियन (राजकुमार राव) पड़ताल करता है. धीरे-धीरे कहानी आगे बढ़ती है और अंततः इलाहाबाद की हाई कोर्ट इस केस में प्रोफेसर सिरस को निर्दोष मानती है और यूनिवर्सिटी में एक बार फिर से प्रोफेसर सिरस की बहाली हो जाती है.

फिल्म की कहानी अपूर्व असरानी ने लिखी है जिन्होंने 'सत्या' और 'शाहिद' जैसी फिल्में एडिट भी की हैं. कहानी काफी सरल है लेकिन इसका मैसेज बेहद जबरदस्त है, जो फिल्म के साथ-साथ सामने भी आता है. अलीगढ़ के रीयल लोकेशंस पर फिल्म को शूट करना और परदे पर उतारा जाना भी काबिल ए तारीफ है. प्रोफेसर का अकेलापन, एक पत्रकार का प्रोफेसर के संग रिश्ता और साथ ही सिलसिलेवार घटनाओं को बड़े सहज तरीके से अपूर्व ने कहानी में तब्दील किया है.

फिल्म में मनोज बाजपेयी ने बहुत उम्दा अभिनय किया है और किरदार की बारिकी को हरेक फ्रेम में आसानी से देखा जा सकता है. प्रोफेसर जिसे संगीत पसंद है साथ ही अपने अकेलेपन में वो कैसे गुजर बसर कर रहा है, इन सभी बातों को मनोज ने अभिनय के माध्यम से पूरा किया है. वहीं राजकुमार राव ने एक साउथ इंडियन पत्रकार का रोल अदा किया है जो हिंग्लिश भाषा में प्रोफेसर के साथ बातचीत करके इस पूरी घटना पर पड़ताल करता है. राजकुमार राव की मेहनत लाजवाब है. आशीष विद्यार्थी ने भी अपने छोटे लेकिन इम्पोर्टेन्ट रोल को बखूब निभाया है.

फिल्म में लता मंगेशकर के दो गीतों को प्रयोग में लाया गया है जो कहानी के साथ जाते हैं और बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है. हंसल मेहता, राजकुमार राव और मनोज बाजपेयी की फिल्मों को देखना पसंद करते हैं तो 'अलीगढ़' मिस मत कीजिए.


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'बेहतरीन फिल्म' की मिसाल 'नीरजा' - One of the wonderful movie Neerja

शुक्रवार कई फिल्में रिलीज़ हुईं, लेकिन सभी की नज़रें टिकी थीं 'नीरजा' पर, जो पैन एम की फ्लाइट अटेन्डेन्ट नीरजा भनोट की कहानी है... नीरजा ने 5 सितंबर, 1986 को हाईजैक हुई पैन एम फ्लाइट 73 से 359 यात्रियों को बहादुरी से बचाया और शहीद हो गई... भारत में नीरजा को मरणोपरांत अशोक चक्र दिया गया, और साथ ही पाकिस्तान की ओर से भी 'तमगा-ए-इन्सानियत' से सम्मानित किया गया... नीरजा को विदेशों में भी कई सम्मान दिए गए...

फिल्म 'नीरजा' में शीर्षक भूमिका में हैं सोनम कपूर, और उनके माता-पिता के किरदारों में शबाना आज़मी और योगेन्द्र टिकू दिखाई दिए... नीरजा के दोस्त के महत्वपूर्ण किरदार निभाते हुए अभिनय क्षेत्र में पदार्पण कर रहे हैं संगीतकार जोड़ी विशाल-शेखर के शेखर रावजियानी...

'नीरजा' की कहानी एक ओर जहां आपको भावनाओं के सफर पर ले जाती है, वहीं यह आपको बहादुरी की बेहतरीन मिसाल भी देकर जाती है... फिल्म की खामियों की बात करें तो मुझे लगता है कि 'नीरजा' में नायिका की बहादुरी के साथ-साथ हाईजैक में फंसे यात्रियों की दशा, खौफ और घुटन को फिल्मांकन के जरिये और दर्शाया जाना चाहिए था, क्योंकि कहीं-कहीं भावनात्मक सफर कुछ सपाट-सा होने लगता है... दूसरे शब्दों में कहूं, तो मामूली-सी टेकिंग की कमी लगी मुझे, वरना 'नीरजा' बेहतरीन कहानी, बेहतरीन स्क्रीनप्ले और बेहतरीन फिल्म की मिसाल है...


फिल्म में बहुत ज़्यादा लोकेशन नहीं है, कोई मिर्च-मसाला भी नहीं है, लेकिन फिर भी फिल्म अंत तक आपको हिलने नहीं देती... 'नीरजा' की कहानी में निर्देशक राम माधवानी ने बड़ी चतुराई और कामयाबी के साथ फ्लैशबैक का इस्तेमाल किया है, जो न तो फिल्म के नैरेशन में बाधा डालता है, और न ही ऐसा महसूस कराता है कि फिल्म इस अहम पड़ाव पर क्यों जा रही है... फिल्म का शूट, किरदार और ट्रीटमेंट वास्तविक रखा गया है...

अभिनय की बात करें तो सोनम ने पूरी ईमानदारी के साथ अपना किरदार निभाया है, लेकिन दर्शकों के दिलों पर छाप और आंखों में पानी छोड़ जाएंगी शबाना आज़मी, जिन्होंने इतना गज़ब अभिनय किया है कि सिनेमाहॉल से बाहर आने पर भी फिल्म और शबाना आज़मी की परफॉरमेंस के असर से बाहर निकलने में कुछ वक्त लगा... फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर सहज और असरदार है, सिनेमोटोग्राफी विषय को कामयाबी से पेश करती है, गाने कहानी के नैरेशन का हिस्सा लगते है और गीतों के बोल भी अच्छे हैं, लेकिन ज़बान पर ठहरते नहीं...

अंत में इस बार मैं बिल्कुल नहीं कहूंगा कि "जाइए, फिल्म देखिए और खुद फैसला कीजिए...", बल्कि कहूंगा कि 'नीरजा' ज़रूर देखिए,



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बॉक्सिंग के अलावा भी बहुत कुछ है फिल्म साला खड़ूस में

फिल्म 'साला खड़ूस' को प्रोड्यूस किया है आर माधवन और राजकुमार हिरानी ने और इसकी निर्देशक हैं, सुधा कोंगरा। फिल्म की कहानी है, महिला बॉक्सर मदी और उसके कोच आदि के रिश्तों की। उनके इर्द-गिर्द खेल में फैली राजनीति और खेल में घर करती ईर्ष्या की भावना की, जो फिल्म का प्रोमो देखकर साफ हो जाता है और प्रोमो देखने के बाद मेरा सबसे बड़ा डर यह था कि कहीं जितना प्रोमो है, उतनी ही फिल्म की कहानी न हो, ऊपर से हम बॉक्सिंग पर कई फिल्में पहले ही देख चुके हैं तो एक सवाल मन में यह भी था कि शायद ही हमें इस फिल्म में कुछ नया देखने को मिले।

पर फिल्म ने मेरे सारे डर दूर कर दिए। आपको बता दूं कि इस फिल्म में आर माधवन बॉक्सिंग कोच के किरदार में हैं और उनकी शागिर्द बनी हैं, रितिका सिंह, जो रियल लाइफ में खुद एक बॉक्सर हैं। साथ ही फिल्म में इनके साथ हैं, ज़ाकिर, नासेर, मुमताज़ सरकार और बलजिंदर कौर।

तो सबसे पहले बात करते हैं, फिल्म की खामियों कीं। सबसे पहली खामी, ख़ामी है भी और नहीं भी, दरअसल, इस फिल्म को आने में काफी टाइम लग गया और इस बीच 'लाहौर', 'मैरी कॉम' और 'ब्रदर्स' जैसी फिल्में आ गईं तो हो सकता है कुछ लोग इसे सिर्फ बॉक्सिंग पर केंद्रित फिल्म समझकर सिनेमा हॉल तक न जाएं, हो सकता है दर्शक यह सोचने लगे कि विषय बासी है।

दूसरी बात यह है कि फिल्म का पहला हिस्सा कहानी की नींव रखता है, जो हो रहा है स्क्रीन पर वह खास नया तो नहीं पर फिर भी आपको बांधे रखता है। तीसरी ख़ामी हो सकता है, जो बॉक्सर है या जो इस खेल की तकनीक से भली-भांति परिचित हैं, उन्हें कहीं लगे यह बांक्सिंग फिल्म नहीं है या कहीं-कहीं फिल्मी हो गई।

तो ये थी कुछ मामूली खामिया और अब बात खूबियों की। पहली बात आप बॉक्सर न होते हुए भी इस फिल्म से जुड़ते हैं और फिल्म आपको भावनात्मक सफर पर ले जाती है। और जैसा मैंने कहा, बॉक्सिंग फिल्म का केंद्र जरूर है पर इस रिंग में और भी बहुत कुछ है बॉक्सिंग के अलावा।

फिल्म का कोई भी हिस्सा सुर से नहीं भटकता और यह फिल्म अपनी कहानी और विषय के प्रति ईमानदार रहती है। फिल्म के किरदारों ने दमदार अभिनय का परिचय दिया। आर माधवन अपने किरदार से 1 सेंटीमीटर भी हिलते नजर नहीं आते, अपने किरदार पर उनकी मेहनत साफ नजर आती है। बेहतरीन अभिनय किया है, माधवन ने। वहीं नई नवेली रितिका का बेबाकपन और रॉनेस फ़िल्म के लिए वरदान साबित होती है। पूरी ऊर्जा और ईमानदारी के साथ रितिका मदी के किरदार में जान डालने में सफल रहती हैं। फ़िल्म की स्क्रिप्ट, स्क्रिन-प्ले, डायलॉग्स, बैकग्राउंड स्कोर, सिनेमाटोग्राफ़ी सब विषय को सहयोग देकर उसे एक बेहतरीन प्रोडक्ट बनाते हैं। मैं यहां अभिनेता नासेर की भी तारीफ करना चाहूंगा, वह कमाल के एक्टर हैं, रोल उनका छोटा है पर किरदार को कैसे बड़ा बनाया जाता है, उनसे सीखना चाहिए। वहीं ज़ाकिर अपनी उम्मीद पर खरे उतरते हैं। कुल मिलाकर 'साला खड़ूस एक अच्छी फिल्म और इसे यह सोचकर न छोड़ें कि बॉक्सिंग पर आप पहले भी कई फ़िल्में देख चुके हैं। मेरी तरफ से 'साला खड़ूस' को 3.5 स्टार।

Movie Review: 'शानदार'

फ़िल्म- शानदार
निर्माता- फॉक्स स्टार स्टूडियो और फैंटम
निर्देशक- विकास बहल

संगीतकार -
अमित त्रिवेदी

कलाकार- शाहिद कपूर, आलिया भट्ट ,पंकज कपूर ,सना कपूर और अन्य

रेटिंग-
दो

हिंदी सिनेमा में शादी पर  कई फिल्मों की कहानी ,गीत और दृश्य बुने गए हैं. विकास बहल की यह फ़िल्म डेस्टिनेशन वेडिंग यानि दूर कहीं किसी जगह पर फॅमिली और दोस्तों के साथ मिलकर भव्य शादी के इनदिनों चर्चित फॉर्मूले पर आधारित है। दो यूरोप  के अमीर परिवार हैं. जिनके बच्चों के बीच शादी हो रही है। शादी के प्लानर जोगिन्दर (शाहिद ) हैं और आलिया की बहन की शादी हो रही हैं. इस शादी में आलिया और जोगिन्दर एक दूसरे के करीब आ जाते  हैं. आलिया के पिता बिपिन (पंकज कपूर) को इससे  ऐतराज़ है. ऐसे में  इनके प्यार को कैसे स्वीकृति मिलती है यही इस रोमांटिक कॉमेडी फिल्म की कहानी है।  फ़िल्म का फर्स्ट हाफ थोड़ा एंटरटेनिंग ज़रूर है।सेकंड हाफ के बाद कहानी में बिखराव नज़र आता है। दृश्यों का खुद में सामंजस्य नज़र नहीं आता है.

स्क्रीनप्ले की खामियां फिल्म को बोझिल बना जाती हैं. क्वीन जैसी सशक्त विषय पर  फिल्म बना चुके विकास बहल की यह फिल्म है इस बात पर ज़रूर अचरज होता है. फिल्म का क्लाइमेक्स थोपा जान  पड़ता है. फिल्म में सिर्फ भव्यता का ध्यान रखा गया है. फिल्म की कॉमेडी भी कुछ दृश्यों को छोड़ गुदगुदाती नहीं है. कई सीन ज़बरदस्ती के बनाए लगते हैं मेहँदी विद करन  एक ऐसा ही  दृश्य है. फ़िल्म में पहली बार शाहिद कपूर और आलिया भट्ट की जोड़ी बनी है जो किसी विज़ुअल ट्रीट से कम नहीं है.

फ़िल्म में उनकी जोड़ी बहुत फ्रेश और क्यूट लग रही है जिससे उनकी बीच के इनकार इकरार के दृश्य खास बन गए हैं. आलिया  भट्ट और शाहिद कपूर ने अपने दिए गए दृश्यों में पूरी मेहनत की है. पंकज कपूर उम्दा अभिनेता हैं फिर स्क्रिप्ट चाहे जैसी भी हो वह अपना जादू चला ही देते हैं लेकिन इन कलाकारों का उम्दा अभिनय भी फिल्म को बचा नहीं पाता है. पंकज कपूर की बेटी सना इस फ़िल्म से अपने कैरियर की शुरुवात की है.पहली फ़िल्म होने के नाते वह अच्छा कर गयी हैं हाँ वह और अच्छा कर सकती थी.

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है खासकर क्लाइमेक्स में। फिल्म में करन जोहर फिर से अभिनय करते दिख रहे हैं.बतौर अभिनेता वह कई बार परदे पर नाकामयाब हुए हैं लेकिन फिर भी वह लगातार नज़र आ रहे  हैं फिल्मों में यह बात समझ नहीं आती है. अमित त्रिवेदी का संगीत अच्छा है. फिल्म के मुड को बखूबी दर्शाता है. फ़िल्म के कई गीत पहले ही हिट हो चुके हैं. फिल्म के सवांद औसत हैं. फिल्म विदेश में शूट हुई है इसलिए फिल्म के लोकेशन बहुत खूबसूरत हैं  कुलमिलाकर फिल्म अपने नाम के विपरीत है हाँ फिल्म का गीत तो रायता फ़ैल गया ज़रूर इसका सटीक शीर्षक साबित होता है.